Rक्षण @10% None Of The All

आप सभी जानते हैं कि हमारे भारत के अंदर 2019 में 20 बनने का खेल शुरु हो गया है और इस खेल का अंंत मई माह के मध्य में होगा ।कोई पार्टी चौका  लगा रहा है तो कोई छक्का लगा रहा है पर गेंद पर किसी का ध्यान ही नहीं जाता कि बेचारा गेंद का क्या हाल है  ।सभी चौके और छक्के लगाने  में मस्त हैं ।तभी बेचारा गेंद मजबूरी में स्विंंग कर विकेट लेने लगता है । तभी सभी पार्टियों का ध्यान गेंद की तरफ जाता है ।सभी पार्टियां चौका-छक्का  लगाने के लिए गेंद पर जोर प्रहार करने बजाय अब उतना ही प्रहार करतीं हैं जिससे एक रन मिल जाय और वो भी दौङ कर ।

भरतीय राजनीति का ये कङवा सच है कि जो भी पार्टी सत्ता पर काबिज होती है वो जनता को क्रिकेट के गेंद की तरह धुनाई करने लगती है ।विगत साल में हुए पांच राज्यों के चुनाव परिणाम तो यही साबित करते हैं । ये उसी चुनाव के परिणाम है कि केंद्र की सत्ता पर बैठी भाजपा सरकार हारने के बाद सवर्णो को दस प्रतिशत आरक्षण देने का प्रावधान संविधान में संशोधन कर करती है जो अपने आप में एक जटिल  प्रक्रिया है ।यही भारतीय प्रजातंत्र की विशेषता है ।वास्तव में यही प्रजातंत्र है ।वास्तव में प्रजातंत्र में प्रजा ही सर्वोपरि है ,प्रजा ही मालिक है ।

केंद्र में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी की सरकार ही राजस्थान ,मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ मे सत्तारूढ़ थी । जिसमें राजस्थान को छोर कर बाकी दो राज्यों मे विगत पंद्रह साल से राज्य कर रही थी। लंबे समय से राज्य करने के कारण या भारत के अन्य राज्यों में लगातार चुनाव जीतने के कारण भाजपाइयों को घमंड हो गया था और उन्हें यह लगने लगा था कि हम इसी तरह जनता को उल्लू बना कर चुनाव जीतते चले जायेंगे । जिन तीन राज्यों में चुनाव हुुए उन राज्यों में कई बङे प्रदर्शन हुए ,घोटाले हुए ,लोग सङको पर उतरे परंतु न तो राज्य सरकार और न तो केंद्र सरकार ही अपनी जिम्मेदारी निभाई ।ऐसे में विपक्षी पार्टी काँग्रेस ने किसानों ,नौजवानों ,व्यापारियों और आम आदमी का विश्वास हासिल करने के लिए लोक लुभावन वादे करने लगी। तीनों प्रदेशों के सवर्ण मतदाताओं ने चुनाव से पूर्व ही एलान कर दिया था कि इस बार वे लोग चुनाव में किसी भी दल को अपना मत नहीं देंगे बल्कि सभी उम्मीदवारों को नकारते हुए नन औफ द औल(None of the all) नोटा  का बटन दबाएगे।जब चुनाव परिणाम आये तो भाजपा की सरकार चली गयी और उनका घमंड टूट गया।जब हार का विश्लेषण हुआ तो पता चला कि 25-30 सींटे वैसी थी जिस पर हार जीत का अंतर नोटा पर पङेे  मतो से कम था। इस तरह सवर्णों ने पहली बार नोटा का बटन दबाकर यह दिखा दिया कि आप हमें क्रिकेट के गेंद जैसी धुनाई करोगे तो वक्त आने पर हम भी तुम्हें फुटबॉल की तरह किक मारते रहेगें कि अगले पांच साल तक जनता तुम्हें अपने पैरों से किक मारती रहेगी।इसी डर का परिणाम हुआ कि केंद्र में सत्तासीन भाजपा की सरकार चुनाव में जाने के ठीक पहले सवर्णों को 10% आरक्षण का कोटा नोटा के डर से  दिया (Rक्षण @10% none of the all)।

वास्तव में केंद्र की मोदी सरकार अपने शासन के  प्रारंभिक काल में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाये जो देश की भला के लिए थे न कि मत प्राप्ति के लिए।उठाये गये उन कदमों का परिणाम भले ही दुष्परिणाम में बदल गये।तब भी मोदी सरकार देशहित में कदम उठाती रही।लेकिन चुनाव की आहट सुनते ही वोटों को प्रभावित करने वाले फैसले लेने लगी जिसमें तीन तलाक और आरक्षण का मुद्दा अहम है।परिणाम स्वरूप मोदी सरकार भी अन्य सरकारों की पंक्ति में जा खङी हुईऔर हद तो तब हो गई जब फरवरी में अंतरिम बजट के बहाने सरकारी खजाने से लोगों का वोट खरीदने लगी।इन कदमों से सरकार की अपनी लोकप्रियता में कमी आई है।लगता है सवर्णों को दिया गया 10% आरक्षण भी नोटा वाली स्थिति से बेहतर परिणाम दिलाने की स्थिति में नहीं है।इसीलिये हम तो यही कहते हैं कि Rक्षण @ 10% not above the all

 

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“गरीबी ” नेताओं की पूँजी

गरीबी “—नेताओं की पूँजी

गरीबी रेखा या निर्धनता रेखा (poverty line) आय के उस स्तर को कहते हैं जिससे कम आमदनी होने पे इंसान अपनी भौतिक ज़रूरतों को पूरा करने में असमर्थ होता है। गरीबी रेखा अलग अलग देशों में अलग अलग होती है।

यूरोपीय तरीके के रूप में परिभाषित वैकल्पिक व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें गरीबों का आकलन ‘सापेक्षिक’ गरीबी के आधार पर किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति की आय राष्ट्रीय औसत आय के 60 फीसदी से कम है, तो उस व्यक्ति को गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिताने वाला माना जा सकता है। औसत आय का आकलन विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है

भारत में योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले शख्स को गरीब नहीं माना जा सकता है। गरीबी रेखा की नई परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला शख्स बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है। अपनी यह रिपोर्ट योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामे के तौर पर दी। इस रिपोर्ट पर खुद प्रधानमंत्री ने हस्ताक्षर किए थे। आयोग ने गरीबी रेखा पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहा कि दिल्ली, मुंबई, बंगलोर और चेन्नई में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3860 रुपये खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता।

अगर हम गरीबी की पैमाइश के अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बात करें, जिसके तहत रोजना 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीब है तो अपने देश में 456 मिलियन (लगभग 45 करोड़ 60 लाख) से ज्यादा लोग गरीब हैं।

सत्ता में आने के बाद से, मौजूदा एनडीए सरकार ने भारत की गरीबी के बोझ को कम करने के लिए कई योजनाएं चलायी हैं:-

प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) एक ऐसी ही योजना है। ऐसा लगता है कि आर्थिक रूप से वंचित लोग मूल बचत खाते, बीमा, क्रेडिट और आवश्यक पेंशन और प्रेषण जैसी विभिन्न वित्तीय सेवाओं तक पहुँच हासिल कर रहे हैं। इस योजना में निवेश करने वाले लोग जमा की गई राशि पर ब्याज पा सकते हैं और इसमें आकस्मिक दुर्घटना बीमा की राशि 1 लाख रुपए है। इस योजना के अन्तर्गत खोले गए खातों में न्यूनतम राशि की आवश्यक्ता नहीं होती है जिसे हमेशा खातो में बनाए रखा जाना चाहिए।

इस योजना में 30,000 रुपये का जीवन बीमा प्रदान किया जाता है और जिसे खाताधारक छह महीने के बाद ओवरड्राफ्ट सुविधा की सहायता से उपयोग में ला सकते हैं। एकल परिवार के लिए ओवरड्राफ्ट की अधिकतम राशि 5,000 रुपये है। पीएमजेडीवाई खाता धारकों को अन्य बीमा और पेंशन-आधारित वित्तीय सुविधाओं को दिलाने में भी मदद करता है। खाता धारकों को रूपे डेबिट कार्ड भी प्रदान किए गए हैं। इस योजना को 8 अप्रैल 2015 को शुरू किया गया था।

बीमा योजनाएं

9 मई को, कम आय वाले समूहों और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के सदस्यों के लिए प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (पीएमजेजेबीवाई) और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (पीएमएसबीवाई) जैसी कुछ बीमा योजनाएं शुरू की गईं। पीएमजेजेबीवाई में 18 से 50 वर्ष की आयु के लोग शामिल किए गए हैं। इस योजना के तहत बीमा कराने वाले लोगों को 330 रुपये की सालाना बीमा किस्त का भुगतान करना होगा और उन्हें 2 लाख रुपये का जीवन सुरक्षा बीमा प्रदान किया जाएगा।

पीएमएसबीवाई 18 से 70 वर्ष की आयु के लोगों को शामिल करता है। इस बीमा की सालाना किस्त सिर्फ 12 रुपए है। खाताधारकों को दुर्घटना में आंशिक विकलांगता के मामले में 1 लाख रुपए और पूर्ण विकलांगता या मृत्यु होने पर 2 लाख रुपए की सहायता प्रदान की जाएगी।

कृषि योजनाएं

किसान विकास पत्र को वर्ष 1998 में भारतीय डाक द्वारा पहली बार शुरू किया गया था, अब इसे फिर से शुरू किया गया है। इस योजना में किसान 1,000 रुपये से लेकर 10,000 और 5,000 से 10,000 रुपये तक के मूल्यवर्ग का निवेश कर सकते हैं। निवेशक 100 महीनों के बाद अपना पैसा दोगुना होने की उम्मीद कर सकते हैं। बचत प्रमाणपत्र योजना में एक समय में एक या कई व्यक्ति सम्मलित हो सकते हैं। खाताधारक 8.7% की ब्याज दर से ऋण प्राप्त कर सकते हैं और धन को अपने कार्यों में इस्तेमाल कर सकते हैं। कृषि अंबानी बीमा योजना उन किसानों की मदद करने की कोशिश करती है, जो प्राकृतिक आपदाओं के कारणों से वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं और जिसके कारण उनकी खेती में रुकावटें आ रही हैं और उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना देश के विभिन्न हिस्सों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने का प्रयास करती है।

ग्रामीण योजनाएं

प्रधानमंत्री सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरूआत 11 अक्टूबर 2014 में हुई थी, इस योजना में सांसदों को ग्रामीण विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सांसदों को जिम्मेदारी दी गई है कि उनके द्वारा तीन गाँवों में भौतिक, सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का विकास वर्ष 2019 तक हो जाना चाहिए। वर्ष 2024 तक उन्हें आठ गाँवों को विकसित करना होगा। सांसदों को पहले गाँव का विकास वर्ष 2016 तक पूरा करना है। उम्मीद है कि वर्ष 2024 तक 6,433 आदर्श गाँवों का निर्माण हो जाएगा।

दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों को बिजली की निरंतर आपूर्ति प्रदान करने के लिए जानी जाती है। राष्ट्रीय प्रशासन ने इस योजना के एक हिस्से के रूप में 75,600 करोड़ रुपये का निवेश किया है। इस योजना ने राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का स्थान ले लिया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 98 वीं जयंती के दिन ही 25 सितंबर 2014 को दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना को शुरू किया गया था। यह योजना भारत के 18 से 35 वर्ष की आयु के ग्रामीण लोगों को रोजगार प्रदान करने का प्रयास करती है।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा)

नरेगा विधेयक वर्ष 2005 में पारित हुआ था और यह वर्ष 2006 से प्रभावी हो गया था। यह वर्ष 2008 में नरेगा से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) बन गया। इस योजना के अन्तर्गत, पूरे देश के गाँव के लोगों के लिए 100 दिन के काम की गारंटी दी जाती है। यह एक सफल योजना रही है क्योंकि इसके कारण ग्रामीण इलाकों के गरीब लोगों के आय स्तर में वृद्धि हुई है। यह योजना लोगों की आवश्यकतानुसार उन्हें काम के अवसर प्रदान करती है। हालांकि इसमें ज्यादातर अकुशल शारीरिक श्रम शामिल है, लेकिन फिर भी यह आर्थिक रूप से गरीब लोगों के लिए कुछ सुरक्षा की सुविधाएं प्रदान करता है। इस योजना से मिलने वाली आय की मदद से गरीब लोगों को कुछ संपत्ति बनाने में मदद मिलती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थित में भी सुधार होता है। यह कार्यक्रम प्राथमिक रूप से ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया गया है।

इंदिरा आवास योजना (आईएवाई)

इंदिरा आवास योजना ग्रामीणों को आवास प्रदान करती है। इस योजना का उद्देश्य पूरे देश के गरीब लोगों को 20 लाख आवास प्रदान करना है और जिनमें 65% लाभार्थी ग्रामीण इलाकों के हैं। इस योजना के अनुसार, जो लोग अपना घर बनवाने में सक्षम नहीं हैं, उन लोगों की सहायता करने के लिए सब्सिडी वाले ऋण प्रदान किए जाते हैं। इस योजना को मूल रूप से वर्ष 1985 में शुरू किया गया था और फिर वर्ष 1998 से वर्ष 1999 में इसका नवीनीकरण किया गया था।

एकीकृत ग्रामीण विकास योजनाएं (आईआरडीपी)

एकीकृत ग्रामीण विकास योजना को दुनिया में अपनी तरह की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक माना जाता है। यह योजना भारत में सबसे गरीब लोगों के लिए आय की कमी से उत्पन्न परेशानियों के निवारण के लिए और संपत्तियाँ प्रदान करने के लिए बनाई गई है। यह योजना चयनित स्थानों पर वर्ष 1978 से वर्ष 1979 में शुरू की गई थी। हालांकि, नवंबर 1980 तक पूरा देश इस योजना के दायरे में आ गया था। इस योजना का मुख्य उद्देश्य स्थाई संपत्ति बनाना और उन्हें लक्षित परिवारों को प्रदान करना है, ताकि उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा सके। इस योजना के तहत प्रदान की जाने वाली स्व-रोजगार योजना इसका एक प्रमुख घटक है।

भारत में गरीबी उन्मूलन के लिए भारत सरकार द्वारा शुरू की गई कुछ अन्य योजनाएं निम्न हैं:

अन्नपूर्णा योजना

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (एनआरईपी)

राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (एनएमबीएस)

ग्रामीण श्रम रोजगार गारंटी योजना (आरएलईजीपी)

राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (एनएफबीएस)

टीआरवाईएसईएम योजना

राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (एनओएपीएस)

जवाहर रोजगार योजना (जेआरवाई)

बंधुआ मुक्ति मोर्चा

स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना

संपत्ति के केंद्रीकरण को रोकने के लिए कानून का संशोधन करना

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता योजना (एनएसएपी)

अंत्योदय योजना

ग्रामीण आवास योजना

लघु किसान विकास योजना (एसएफडीपी)

प्रधानमंत्री रोजगार योजना

सूखा क्षेत्र विकास योजना (डीएडीपी)

नेहरू रोजगार योजना (एनआरवाई)

बीस अंकीय योजना

शहरी गरीबों के लिए स्वयं रोजगार योजना (एसईपीयूपी)

कार्य योजना के लिए भोजन

प्रधानमंत्री की एकीकृत शहरी गरीबी उन्मूलन योजना (पीएमआईयूपीईपी)

न्यूनतम आवश्यकता योजना (एमएनपीे आधार पर तय गरीबी रेखा के आधार पर जो गरीब आबादी निकलेगी वह कुल आबादी के 50 फीसदी से कम रहेगी।

 

योजना आयोग ने 2004-05 में 27.5 प्रतिशत गरीबी मानते हुए योजनाएं बनाई थी। फिर इसी आयोग ने इसी अवधि में गरीबी की तादाद आंकने की विधि की पुनर्समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया था, जिसने पाया कि गरीबी तो इससे कहीं ज्यादा 37.2 प्रतिशत थी। इसका मतलब यह हुआ कि मात्र आंकड़ों के दायें-बायें करने मात्र से ही 100 मिलियन लोग गरीबी रेखा में शुमार हो गए।

अगर हम गरीबी की पैमाइश के अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बात करें, जिसके तहत रोजना 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीब है तो अपने देश में 456 मिलियन (लगभग 45 करोड़ 60 लाख) से ज्यादा लोग गरीब हैं।

अब सोचने वाली बात है कि जिन नेताओं ने गरीबी दूर करने के लिए इतनी सारी योजनाएँ चलायी फिर भी गरीबी बढती ही जा रही है परंतु  नेताओं के लिए कोई भी योजना नही चलती फिर भी उनकी संपत्ति दिन दुनी रात चौगुनी बढती जा रही है ।ऐसी परिस्थिति हमें यह सोचने के लिए विवश कर देती है क्या ये सारी योजनाएँ वास्तव में गरीबी मिटाने के लिए है या नेताओं की संपत्ति बढाने के लिए है ।जिस विधि से इन नेताओं की संपत्ति बढती है वही विधि अपनाकर गरीबों की गरीबी आखिर क्यों नही दूर किया जाता है ? क्या संपत्ति बढाने की इस विधि को नेताओं ने अपने नाम पेटेंट करा लिया है ?

 

 

भारत में गरीबी एवम् नेतााओं का अन्योनाश्रय संबंध है ।ऐसे लगता है जैसे एक दूजे के बीन इन दोनों का अस्तीत्व संभव नही है ।गरीबी वह पोषक पौधा है जिस पर अमरलता रुपी नेता फैलता और फूलता है । अगर गरीब की आमदनी घटेगी तो इन नेताओं की आमदनी बढेगी यानी दोनों के बीच व्युतक्रमानुपाती संबंध है ।ऐसी परिस्थति में कौन नेता कालीदास बनेगा जो उसी डाल को काटेगा जिस पर वह खुद बैठा हुआ है ?ये तो गरीबों की गलती है कि वह यह सोच बैठता है कि कालीदास सरीखे कोई न कोई नेता आयेगा जो उसी डाल को काटेग जिस पर वह खुद बैठा है ।गत आम चुनाव 2014 में लोगों को लगा कि कालीदास सरीखे एक नेत आया है जो गरीबी तो दूर करेगा ही एवम् उस डाल को ही नहीं काटेगा जिस पर वह खुद बैठा है अपितु उस पेङ को ही समूल नष्ट कर  डालेगा जिस पर वह खुद बैठा है ।परिणामत: उस नेता की पार्टी को भारी बहुमत से लोगों ने जीताया ।पर अब अगला आम चुनाव होने वाला है पर गरीब का सपना हो न सका अपना ।

भारत को आजाद हुए 70 साल से भी अघिक हो गये पर जितनी गरीबी स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले थी आज उससे भी अधिक है ।परंतु आश्चर्य की बात है कि भारत में जितने भी नेता हुए उनकी संपति की वृद्धि इतनी हो गयी कि पुस्त दर पुस्त संपति का भोग करने के बाद भी संपति खत्म होने का नाम ही नहीं लेती ।वास्तव में गरीबी बढ़ा रहा है पूँजी का केन्द्रीयकरण । दावोस बैठक के पूर्व ही आँक्सफैम जो गरीबी उन्मूलन के लिए काम करता है ,ने सर्वे कर यह प्रकाशित किया कि देश का 73% आमदनी मात्र 1% अमीरों के पास है ।देश के 67 करोड़ लोगों की आय में महज 1% की वृद्धि हुईं  है जबकि अमीरों की आय में 20.9 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुईं है जो कि देश के वार्षिक बजट के बराबर है ।इस असमानता के कारण भारत में 2016 में अरबपतियों की संख्या 84 थीं  से बढकर 2017 में 101 हो गयी । 2016 मे देश के 1%अमीरों के पास देश की आमदनी का 58% हिस्सा था जबकि वैश्विक अनुपात 50% था ।2017 में यह वैश्विक अनुपात 82% है और विश्व की 3.7अरब की आधी आबादी की आमदनी में कोई वृद्धि ही नहीं  हुई । वस्त्र उद्योग में लगे भारतीय मजदूर को उसी उद्योग में लगे शीर्ष अधिकारी के बराबर वेतन पाने में उसे कम से कम 941 वर्ष लगेगें  । इसिलिए सर्वेकर्ता ने यह सुझाव दिया कि भारत ,अमेरिका और ब्रिटेन जैसे  देशों को अपने अधिनस्थ कार्यपालक पदाधिकारियों के वेतन 60% कम किये जाँय । पर अफसोस की बात है कि जनप्रतिनिधियों का वेतन मनोनुकूल बढता ही जा रहा है ।उच्च पदस्थ पदाधिकारियोंं का वेतन निम्नवर्गीय कर्मचारियों की तुलना में  कई गुणा अधिक है जो इस असमानता की खाई को और अधिक बडाता है ।इन सारे सुझावों को अमल में लाने का दायित्व उन्हीं नेताओं पर है जिनकी आमदनी रातों रात भादों माह की नदियों की तरह उफान मारने लगती है । इसिलिए शिर्षक का नाम “गरीबी ” नेताओं की पूँजी रखा गया है ।

समझौता

हूल दिवस




हिन्दी का एक छोटा सा शब्द समझौता जिसे जानते तो सभी है पर हमारे जीवन पर इसका प्रभाव कितना बङा है इससे अनभिज्ञ बहुत लोग हैं ।जो लोग समझौते से वाकिफ हैं उसमें से भी प्रायः लोग इसके प्रभाव को नजरअंदाज कर निकल जाते हैं ।जिन्दगी के हर मोङ  पर कभी समझौता कर आगे बढ जाता है इनसान तो कभी बिन समझौता किये भी इनसान आगे बढ़ जाता है ।इनसान जन्म के बाद से ही समझौता करना या नही करना सीख जाता है और इनसान को यह पता भी नहीं चलता कि कब वह समझौता किया और कब नही किया ।लोग समझौता करके सफलताओं की बुलंदियों तक पहुँच जाते हैं तो कई लोग समझौता किए बिना भी सफलताओं की बुलंदियों को पार कर जाते हैं ।इनसान तो इनसान है कई संस्थायें जिन्हें कानूनी रुप से इनसान का दर्जा प्राप्त है वो भी कभी समझौता करके तो कभी नही करके सफलताओं की बुलंदियों  को प्राप्त कर चुके हैं ।उत्तर कोरिया की चर्चा हर जगह होती है कि उसने अपने से कई गुणा ताकतवर देश अमेरिका को भी तबाह करने की क्षमता रखता है और इस क्षमता को विकसित करने के लिए उसने किसी से समझौता नहीं किया  ।इसी तरह हमारा देश भारत अपने हितों को ध्यान में रखकर कई देशों से समझौता कर सफलताओं की सीढियाँ पर चढना चाहता है ।

समझौता दो या दो से अधिक व्यक्तियों /कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त संस्थाओं के बीच आपसी सहमति के आधार पर किया जाता है जो कानूनी रुप से समझौते में शामिल सभी पक्षकारों के लिए बाध्यकारी होता है ।कोई भी पक्षकार जो समझौते में शामिल है और समझौते में वर्णित बिन्दुओं को मानने से इन्कार करता है तो अन्य पक्षकार समझौता न मानने वाले के विरुद्ध न्यायालय जा सकता है और समझौते के बिन्दुओं को मानने के लिए बाध्य कर सकता है ।

हाल ही में समपन्न हुए IPL के मैचों में क्रिस गेल जैसे खिलाङी से कोई समझौता करने को तैयार नहीं था और अंत में किंग एलेवन पंजाब से क्रिस गेल का समझौता हुआ ।क्रिस गेल ने लीग मैचों में अपना जलवा दीखते हुए किंग एलेवन पंजाब को टाँप  चार टीमों बनाए रखा ।लेकिन ज्योंहि गेल का बल्ला खामोश होने लगा के एल राहुल जैसे बल्लेबाज भी टीम को टाँप चार टीमों में नहीं पहुचा सके और इस बार भी किंग एलेवन पंजाब की टीम अन्य सालों की भाँति नीचले पायदान पर रही ।

इसी तरह हाल ही में कर्नाटक विधान सभा का चुनाव हुआ जिसमें राज्य की तीनो बङी पार्टियों क्रमशः भाजपा ,काँग्रेस और जनता दल सेक्युलर को क्रमशः 104;78 और 38 सीटें प्राप्त हुई । राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने का न्योता दिया । काँग्रेस राज्यपाल के फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट गयी । सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत  साबित करने के लिए दिये गये 15दिन के समय को घटाकर एक दिन का वक्त दिया ।भाजपा को किसी भी पार्टी से समझौता नही होने के कारण सरकार गंवानी पङी वहीं काँग्रेस और जनता दल सेक्युलर के आपसी समझौता के कारण कुमारस्वामी कर्नाटक के मुख्य मंत्री के पद पर विद्यमान हैं जबकि उनके पास मात्र 38 विधायक ही हैं ।

कभी कभी समझौताा के परिणाम समझौता के पक्षकार न होने के बावजूद भी भुगतना पङता है ।हम सभी जानते हैं कि शादी पति और पत्नी के बीच कियाा गया समझौता है ।जबतक समझौता सही दिशा में चलता है तबतक ही दोनों का आपसी अन्तरंग सम्बंध चलता है ।इसी क्रम में बच्चे पैदा हो जाते हैं ।लेकिन पति पत्नी का सम्बंध जब विच्छेद हो जाता है तो बच्चे को भी परिणाम भुगतना पङता है ।

आज दिनांक 6.6.2018 को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जिनकी पार्टी 22-23 राज्यों में शासन कर रही है ,उद्धव ठाकरे से मिलने श्री ठाकरे के निवास मातोश्री पहुँचेे ।सोचिये जिनकी पार्टी की सरकार पूरे देश पर और कई प्रदेशोंं में शासन कर रही है और भारत की सबसे बङी पार्टी है ।उस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एक क्षेत्रीय पार्टी शिव सेना के अध्यक्ष से मिलने उनके निवास तक पहुंच रहे हैं और अघोषित समझौता करते हैं आखिर क्यों ? इस समझौते की बारीकियों को समझने के लिए भारत के राजनीतिक परिदृश्य को जानना आवश्यक है । एक तो सारे विपक्ष का महागठबंधन जो आहिस्ता आहिस्ता साकार हो रहा है तो दुसरी तरफ भाजपा के पुराने सहयोगी टीडीपी भाजपा से नाता तोड़ चुकी है ।वहीं जदयू बिहार में अपने को बङा भाई घोषित कर चुका है जिसे बिहार भाजपा की ईकाई ने मान भी लिया है ।लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरक्षण के बहाने कङवी वाणी बोलते हैं तो कभी यूपी के राजभर जहर उगलते हैं । ऐसे में 2019 के चुनाव में  सत्ता जाने का डर अभी से सताने लगा है ।इसीलिए भारत के सबसे बङी पार्टी के अध्यक्ष को एक क्षेत्रीय पार्टी शिव सेना के अध्यक्ष के घर जाकर मिलना पङता है ।इसमे भाजपा का भविष्य उज्जवल दिखाई देता है इसलिए उद्धव ठाकरे के घर जाकर अघोषित समझौता कर रहे हैं ।ठीक इसी तरह 2014 में भी हुआ था ।ठाकरे चार साल भाजपा के दरवाजे ठक ठकाते रहे और भाजपा दरवाजे तक नहीं खोली ।भाजपा फिर चुनावी फायदा उठायेगी और चार साल सो जायेगी ।शिव सेना प्रमुख को तत्कालिक फायदा न देखकर दीर्घकालिक नीति अपनानी चाहिए और अपनी छवि सुधारने के लिए कम से कम 2019 का चुनाव स्वतंत्र रुप से लङना चाहिए ताकि भाजपा को यह समझ में आये कि शिव सेना को जितना नुकसान 2019 में होगा उससे कई गुणा अधिक नुकसान भाजपा को होगा ।इसलिए यह समझौता शिव सेना को नही करना चाहिए ।

 

 

 

रामनवमी

आज भगवान श्री राम का जन्म उत्सव पूरा भारत मना रहा है ।जरुरत है कि अब श्री राम का जन्म उत्सव पूरे विश्व में मनाया जाय और इसके लिए पूरे विश्व को प्रेरित किया जाय

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विलुप्त होती गौरैया

चू चू करती जिन गौरैयों की आवाज कभी आँगन में सुबह शाम सुनाई देती थी आज उसी आँगन में बच्चे अपनी माँ से पुछते हैं कि माँ मुझे गौरैया कब दिखाओगी तो माँ कहती है कि गौरैया आते ही दिखा दूँगी ।आखिर बच्चे को गौरैया देखने से वंचित करने वाले कौन लोग हैं ?हम ,आप या समाज या कोई और ।आखिर कौन?

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होली और योगी

 

फाल्गुन का महीना आते ही ये मिजाज़ होलियाना हो जाता है ।बच्चे ,बुढे,जवान ,स्त्री ,पुरुष सबों में रंगों के पर्व का उल्लास छा जाता है ।सभी लोग एक दुसरे से बतियाना ,गपियाना चाहते हैं और ये कहना चाहते हैं कि “आज रपट जाँय तो हमें ना छोङैयो ” ।आश्चर्य कि बात तो ये है कि योगी भी होली के रंग मे रंग गये हैं और मथुरा के बरसाने में लठमार होली खेल रहे हैं और वो भी ब्रज की बालाओं के साथ नहीं बल्कि बालीवुड की मशहूर अदाकारा हेमा मालिनी के साथ ।अब इसे क्या कहेंगे ?कुछ भी तो नही ।नही !नही !ये तो कहना ही पङेगा कि “दिल है कि मानता नही ” ।फागुन का महीना हो और इठलाती ,बलखाती कोई भी हसीना हो तो किसी का भी दिल तो मचलेगा ही और जहाँ शोले की बसंती हो तो गब्बर तो गब्बर है योगी भी योग तोड़ लठमार होली खेल रहे हैं और बसंती से ये वादा करते नजर आये कि बसंती “बरसाने के इस होली ( 2018) को मै अन्तरराष्ट्रीय पहचान दिलाऊँगा “।बेचारा योगी की होली हो या बरसाने की होली हो वो भारत में पहचान का मोहताज नही है ।हाँ मगर योगी के होली खेलने से बरसाने की होली को अन्तरराष्ट्रीय पहचान मिले तो बङी बात होगी ।

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति मकर संक्रांति का पर्व हिन्दुस्तान में सदियों से मनाया जाता है ।वैसे तो भारत में पर्वो  की गणना चंद्र आधारित कैलेंडर पर की जाती है और एक मात्र भारतीय पर्व मकर संक्रांति ही है जिसकी गणना सूर्य आधारित कैलेंडर पर की जाती ।इस कैलेंडर की गणना में अशुद्धियों की गुंजाइश नगण्य होती है ।इसीलिए मकर संक्रांति प्रत्येक साल 14 जनवरी को ही पङता है ।हालांकि मकर संक्रांति की तिथि में भी अंतर आता है जिसकी चर्चा हम पीछे करेंगे ।इस पर्व को भिन्न भिन्न प्रदेशों में भिन्न भिन्न नामों से जाना जाता है जैसे ‘तिल संक्रांति’, ‘खिचड़ी पर्व ।
इस दिन कहीं खिचड़ी तो कहीं ‘चूड़ादही’ का भोजन किया जाता है तथा तिल के लड्डू बनाये जाते हैं। ये लड्डू मित्र व सगे सम्बन्धियों में बाँटें भी जाते हैं।
मकर संक्रान्ति के दिन से सूर्य उत्तरायण होता है, जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। परम्परा से यह विश्वास किया जाता है कि इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह वैदिक उत्सव है। इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़–तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बाँटा जाता है। इस त्यौहार का सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है। ये तीनों चीज़ें ही जीवन का आधार हैं। प्रकृति के कारक के तौर पर इस पर्व में सूर्य देव को पूजा जाता है, जिन्हें शास्त्रों में भौतिक एवं अभौतिक तत्वों की आत्मा कहा गया है। इन्हीं की स्थिति के अनुसार ऋतु परिवर्तन होता है और धरती अनाज उत्पन्न करती है, जिससे जीव समुदाय का भरण-पोषण होता है। यह एक अति महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्य एवं उत्सव है ।                                 तिल संक्राति

देश भर में लोग मकर संक्रांति के पर्व पर अलग-अलग रूपों में तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ का सेवन करते हैं। इन सभी सामग्रियों में सबसे ज़्यादा महत्व तिल का दिया गया है। इस दिन कुछ अन्य चीज़ भले ही न खाई जाएँ, किन्तु किसी न किसी रूप में तिल अवश्य खाना चाहिए। इस दिन तिल के महत्व के कारण मकर संक्रांति पर्व को “तिल संक्राति” के नाम से भी पुकारा जाता है। तिल के गोल-गोल लड्डू इस दिन बनाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई है तथा उपरोक्त उत्पादों का प्रयोग सभी प्रकार के पापों से मुक्त करता है; गर्मी देता है और शरीर को निरोग रखता है। मंकर संक्रांति में जिन चीज़ों को खाने में शामिलकिया जाता है, वह पौष्टिक होने के साथ ही साथ शरीर को गर्म रखने वाले पदार्थ भी हैं।
जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है, उस अवधि को “सौर वर्ष” कहते हैं। पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना “क्रान्तिचक्र” कहलाता है। इस परिधि चक्र को बाँटकर बारह राशियाँ बनी हैं। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना “संक्रान्ति” कहलाता है। इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को “मकर संक्रान्ति” कहते हैं।
सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना ‘उत्तरायण’ तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना ‘दक्षिणायन’ है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। दक्षिणायन में ठीक इसके विपरीत होता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता था। मकर संक्रान्ति के दिन यज्ञ में दिये हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएँ शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर माना जाता है। इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्त्व है और सौ गुणा फलदायी होकर प्राप्त होता है।

 

              खिचड़ी संक्रान्ति
चावल व मूंग की दाल को पकाकर खिचड़ी बनाई जाती है। इस दिन खिचड़ी खाने का प्रचलन व विधान है। घी व मसालों में पकी खिचड़ी स्वादिष्ट, पाचक व ऊर्जा से भरपूर होती है। इस दिन से शरद ऋतु क्षीण होनी प्रारम्भ हो जाती है। बसन्त के आगमन से स्वास्थ्य का विकास होना प्रारम्भ होता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान व सूर्योपासना के बाद ब्राह्मणों को गुड़, चावल और तिल का दान भी अति श्रेष्ठ माना गया है। महाराष्ट्र में ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रान्ति से सूर्य की गति तिल–तिल बढ़ती है, इसीलिए इस दिन तिल के विभिन्न मिष्ठान बनाकर एक–दूसरे का वितरित करते हुए शुभ कामनाएँ देकर यह त्योहार मनाया जाता है।
पवित्र गंगा में नहाना व सूर्य उपासना संक्रान्ति के दिन अत्यन्त पवित्र कर्म माने गए हैं। संक्रान्ति के पावन अवसर पर हज़ारों लोग इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम, वाराणसी में गंगाघाट, हरियाणा में कुरुक्षेत्र, राजस्थान में पुष्कर, महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी में स्नान करते हैं। गुड़ व श्वेत तिल के पकवान सूर्य को अर्पित कर सभी में बाँटें जाते हैं। गंगासागर में पवित्र स्नान के लिए इन दिनों श्रद्धालुओं की एक बड़ी भीड़ उमड़ पड़ती है ।
     

 मकर संक्रांति की तिथियों पर एक नज़र 
सन 2012 में मकर संक्रांति 15 जनवरी यानी रविवार की थी। राजा हर्षवर्द्धन के समय में यह पर्व 24 दिसम्बर को पड़ा था। मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल में 10 जनवरी को मकर संक्रांति थी। शिवाजी के जीवन काल में यह त्योहार 11 जनवरी को पड़ा था।इसी तरह के कुछ अन्य उदाहरण हैं जिसमें मकर संक्रांति की तिथि एवं ,समय के साथ अवधि भी बताया गया है जैसे -1849 में मकर संक्रांति 12जनवरी शुक्रवार को 7.38–12.59तक था जबकि संक्रांति समय 6.09 था ।1850में भी मकर संक्रांति 12 जनवरी शनिवार को 12.15-18.19 था और संक्रांति समय 12.15 था ।1900 में मकर संक्रांति 13जनवरी शनिवार ,1956को 14जनवरी शनिवार तथा 1960 में 14जनवरी वृहस्पतिवार को पङा था ।आखिर ऐसा क्यों?इसे समझने के  गलिए नीचे दिये गये तस्वीर को ध्यान से देखें ।

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Approximate Month Zodiac Rashi Animal
1 April- Aries -Mesha Ram
2 May -Taurus -Vrishabh Bull
3 June- Gemini -Mithuna Couple
4 July -Cancer -Karkata Crab
5 August -Leo -Simha Lion
6 September -Virgo -Kanya Virgin
7 October -Libra -Tula Balance
8 November -Scorpio- Vrischika Scorpion
9 December -Sagittarius -Dhanush Bow
10 January -Capricorn Makara -Alligator
11 February- Aquarius -Kumbha Pot
12 March Pisces

सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने को ‘मकर संक्रांति’ कहा जाता है। दरअसल हर साल सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट की देरी से होता है । वास्तव में सूर्य आधारित कैलेंडर में पृथ्वी को सूर्य का एक वार परिक्रमा करने में 365.256363004 दिन लगता है जबकि सभी प्रकार की गणनाओं में 365 दिन 5 घंटा 49 मिनट 12 सेकंड मानकर गणना  की जाती है ।इस तरह 365.256363004 दिन को सेकंड में परिवर्तित करते हैं तो   31558149 ;सेकंड होता है जबकि 365 दिन 5घंटा 49मिनट 12सेकंड को सेकंड में परिवर्तित करते हैं तो  31556952सेकंड होता  है ।इस तरह 31558149-31556952=1197 सेकंड काा अंतर आता है जो लगभा 20 मिनट होता है ।

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इस तरह हर तीन साल के बाद सूर्य एक घंटे बाद और हर 72 साल में एक दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। इसलिए एक माह देरी से मकर राशि में प्रवेश करने में 1/20x30x24x60 =2160लगेगा । इसी तरह  1728 (72 गुणा 24) साल में फिर सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक दिन की देरी से होगा और इस तरह 2080 के बाद ‘मकर संक्रांति’ 15 जनवरी को पड़ेगी।

विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति का त्योहार भिन्न भिन्न रुपों में मनाया जाता है । इलाहाबाद में यह पर्व माघ मेले के नाम से जाना जाता है. 14 जनवरी से इलाहाबाद मे हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है. 14 दिसम्बर से 14 जनवरी का समय खर मास के नाम से जाना जाता है. और उत्तर भारत मे तो पहले इस एक महीने मे किसी भी अच्छे कार्य को अंजाम नही दिया जाता था. मसलन विवाह आदि मंगल कार्य नहीं किए जाते थे पर अब तो समय के साथ लोग काफ़ी बदल गए है. 14 जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से अच्छे दिनों की शुरुआत होती है. समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है और इस दिन खिचड़ी सेवन एवं खिचड़ी दान का अत्यधिक महत्व होता है. इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक माघ मेला लगती है ।

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पंजाब में इसे ‘लोहड़ी’ कहते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में नई फ़सल की कटाई के अवसर पर मनाया जाता है। पुरुष और स्त्रियाँ गाँव के चौक पर उत्सवाग्नि के चारों ओर परम्परागत वेशभूषा में लोकप्रिय नृत्य भांगड़ा का प्रदर्शन करते हैं। स्त्रियाँ इस अवसर पर अपनी हथेलियों और पाँवों पर आकर्षक आकृतियों में मेहंदी रचाती हैं।

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पश्चिम बंगाल में मकर सक्रांति के दिन देश भर के तीर्थयात्री गंगासागर द्वीप पर एकत्र होते हैं, जहाँ गंगा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। एक धार्मिक मेला, जिसे ‘गंगासागर मेला’ कहते हैं, इस समारोह की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस संगम पर डुबकी लगाने से सारा पाप धुल जाता है। बंगाल में इस पर्व पर स्नान पश्चात् तिल दान करने की प्रथा है. यहां गंगासागर में हर साल विशाल मेला लगता है. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं. मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए व्रत किया था. इस दिन गंगा सागर में स्नान-दान के लिए लाखों लोगों की भीड़ होती है. लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं.

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गुजरात का क्षितिज भी संक्रान्ति के अवसर पर रंगबिरंगी पंतगों से भरा रहता है ।लोग पतंगबाजी का आनंद लेते हैं ।

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तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाया जाता है.पहले दिन भोगी-पोंगल, दूसरे दिन सूर्य-पोंगल, तीसरे दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल, चौथे व अंतिम दिन कन्या-पोंगल. इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकट्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है. पोंगल मनाने के लिए स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनाई जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं. इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है. उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं.

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असम में मकर संक्रांति को माघ-बिहू या भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं. राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद लेती हैं. ।

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झारखंड में मकर संक्रांति का त्योहार वैसे ही मनाया जाता है जैसे बिहार में मनाया जाता है ।लेकिन झारखंड के कुछ जिलोँ में टुसू पर्व के रुप मे मनाया जाता है ।इसी  तरह संथाल परगना में सोहराय पर्व मनाया जाता है ।