“गरीबी ” नेताओं की पूँजी

गरीबी “—नेताओं की पूँजी

गरीबी रेखा या निर्धनता रेखा (poverty line) आय के उस स्तर को कहते हैं जिससे कम आमदनी होने पे इंसान अपनी भौतिक ज़रूरतों को पूरा करने में असमर्थ होता है। गरीबी रेखा अलग अलग देशों में अलग अलग होती है।

यूरोपीय तरीके के रूप में परिभाषित वैकल्पिक व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है जिसमें गरीबों का आकलन ‘सापेक्षिक’ गरीबी के आधार पर किया जाता है। अगर किसी व्यक्ति की आय राष्ट्रीय औसत आय के 60 फीसदी से कम है, तो उस व्यक्ति को गरीबी रेखा के नीचे जीवन बिताने वाला माना जा सकता है। औसत आय का आकलन विभिन्न तरीकों से किया जा सकता है

भारत में योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि खानपान पर शहरों में 965 रुपये और गांवों में 781 रुपये प्रति महीना खर्च करने वाले शख्स को गरीब नहीं माना जा सकता है। गरीबी रेखा की नई परिभाषा तय करते हुए योजना आयोग ने कहा कि इस तरह शहर में 32 रुपये और गांव में हर रोज 26 रुपये खर्च करने वाला शख्स बीपीएल परिवारों को मिलने वाली सुविधा को पाने का हकदार नहीं है। अपनी यह रिपोर्ट योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को हलफनामे के तौर पर दी। इस रिपोर्ट पर खुद प्रधानमंत्री ने हस्ताक्षर किए थे। आयोग ने गरीबी रेखा पर नया क्राइटीरिया सुझाते हुए कहा कि दिल्ली, मुंबई, बंगलोर और चेन्नई में चार सदस्यों वाला परिवार यदि महीने में 3860 रुपये खर्च करता है, तो वह गरीब नहीं कहा जा सकता।

अगर हम गरीबी की पैमाइश के अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बात करें, जिसके तहत रोजना 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीब है तो अपने देश में 456 मिलियन (लगभग 45 करोड़ 60 लाख) से ज्यादा लोग गरीब हैं।

सत्ता में आने के बाद से, मौजूदा एनडीए सरकार ने भारत की गरीबी के बोझ को कम करने के लिए कई योजनाएं चलायी हैं:-

प्रधानमंत्री जन धन योजना (पीएमजेडीवाई) एक ऐसी ही योजना है। ऐसा लगता है कि आर्थिक रूप से वंचित लोग मूल बचत खाते, बीमा, क्रेडिट और आवश्यक पेंशन और प्रेषण जैसी विभिन्न वित्तीय सेवाओं तक पहुँच हासिल कर रहे हैं। इस योजना में निवेश करने वाले लोग जमा की गई राशि पर ब्याज पा सकते हैं और इसमें आकस्मिक दुर्घटना बीमा की राशि 1 लाख रुपए है। इस योजना के अन्तर्गत खोले गए खातों में न्यूनतम राशि की आवश्यक्ता नहीं होती है जिसे हमेशा खातो में बनाए रखा जाना चाहिए।

इस योजना में 30,000 रुपये का जीवन बीमा प्रदान किया जाता है और जिसे खाताधारक छह महीने के बाद ओवरड्राफ्ट सुविधा की सहायता से उपयोग में ला सकते हैं। एकल परिवार के लिए ओवरड्राफ्ट की अधिकतम राशि 5,000 रुपये है। पीएमजेडीवाई खाता धारकों को अन्य बीमा और पेंशन-आधारित वित्तीय सुविधाओं को दिलाने में भी मदद करता है। खाता धारकों को रूपे डेबिट कार्ड भी प्रदान किए गए हैं। इस योजना को 8 अप्रैल 2015 को शुरू किया गया था।

बीमा योजनाएं

9 मई को, कम आय वाले समूहों और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के सदस्यों के लिए प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना (पीएमजेजेबीवाई) और प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना (पीएमएसबीवाई) जैसी कुछ बीमा योजनाएं शुरू की गईं। पीएमजेजेबीवाई में 18 से 50 वर्ष की आयु के लोग शामिल किए गए हैं। इस योजना के तहत बीमा कराने वाले लोगों को 330 रुपये की सालाना बीमा किस्त का भुगतान करना होगा और उन्हें 2 लाख रुपये का जीवन सुरक्षा बीमा प्रदान किया जाएगा।

पीएमएसबीवाई 18 से 70 वर्ष की आयु के लोगों को शामिल करता है। इस बीमा की सालाना किस्त सिर्फ 12 रुपए है। खाताधारकों को दुर्घटना में आंशिक विकलांगता के मामले में 1 लाख रुपए और पूर्ण विकलांगता या मृत्यु होने पर 2 लाख रुपए की सहायता प्रदान की जाएगी।

कृषि योजनाएं

किसान विकास पत्र को वर्ष 1998 में भारतीय डाक द्वारा पहली बार शुरू किया गया था, अब इसे फिर से शुरू किया गया है। इस योजना में किसान 1,000 रुपये से लेकर 10,000 और 5,000 से 10,000 रुपये तक के मूल्यवर्ग का निवेश कर सकते हैं। निवेशक 100 महीनों के बाद अपना पैसा दोगुना होने की उम्मीद कर सकते हैं। बचत प्रमाणपत्र योजना में एक समय में एक या कई व्यक्ति सम्मलित हो सकते हैं। खाताधारक 8.7% की ब्याज दर से ऋण प्राप्त कर सकते हैं और धन को अपने कार्यों में इस्तेमाल कर सकते हैं। कृषि अंबानी बीमा योजना उन किसानों की मदद करने की कोशिश करती है, जो प्राकृतिक आपदाओं के कारणों से वित्तीय संकट का सामना कर रहे हैं और जिसके कारण उनकी खेती में रुकावटें आ रही हैं और उत्पादन भी प्रभावित हो रहा है। प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना देश के विभिन्न हिस्सों में सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराने का प्रयास करती है।

ग्रामीण योजनाएं

प्रधानमंत्री सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरूआत 11 अक्टूबर 2014 में हुई थी, इस योजना में सांसदों को ग्रामीण विकास की जिम्मेदारी सौंपी गई है। सांसदों को जिम्मेदारी दी गई है कि उनके द्वारा तीन गाँवों में भौतिक, सामाजिक और आर्थिक बुनियादी ढांचागत सुविधाओं का विकास वर्ष 2019 तक हो जाना चाहिए। वर्ष 2024 तक उन्हें आठ गाँवों को विकसित करना होगा। सांसदों को पहले गाँव का विकास वर्ष 2016 तक पूरा करना है। उम्मीद है कि वर्ष 2024 तक 6,433 आदर्श गाँवों का निर्माण हो जाएगा।

दीन दयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना (डीडीयूजीजेवाई) कार्यक्रम ग्रामीण क्षेत्रों को बिजली की निरंतर आपूर्ति प्रदान करने के लिए जानी जाती है। राष्ट्रीय प्रशासन ने इस योजना के एक हिस्से के रूप में 75,600 करोड़ रुपये का निवेश किया है। इस योजना ने राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतीकरण योजना का स्थान ले लिया है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 98 वीं जयंती के दिन ही 25 सितंबर 2014 को दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्या योजना को शुरू किया गया था। यह योजना भारत के 18 से 35 वर्ष की आयु के ग्रामीण लोगों को रोजगार प्रदान करने का प्रयास करती है।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (नरेगा)

नरेगा विधेयक वर्ष 2005 में पारित हुआ था और यह वर्ष 2006 से प्रभावी हो गया था। यह वर्ष 2008 में नरेगा से महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) बन गया। इस योजना के अन्तर्गत, पूरे देश के गाँव के लोगों के लिए 100 दिन के काम की गारंटी दी जाती है। यह एक सफल योजना रही है क्योंकि इसके कारण ग्रामीण इलाकों के गरीब लोगों के आय स्तर में वृद्धि हुई है। यह योजना लोगों की आवश्यकतानुसार उन्हें काम के अवसर प्रदान करती है। हालांकि इसमें ज्यादातर अकुशल शारीरिक श्रम शामिल है, लेकिन फिर भी यह आर्थिक रूप से गरीब लोगों के लिए कुछ सुरक्षा की सुविधाएं प्रदान करता है। इस योजना से मिलने वाली आय की मदद से गरीब लोगों को कुछ संपत्ति बनाने में मदद मिलती है, जिससे उनकी आर्थिक स्थित में भी सुधार होता है। यह कार्यक्रम प्राथमिक रूप से ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा कार्यान्वित किया गया है।

इंदिरा आवास योजना (आईएवाई)

इंदिरा आवास योजना ग्रामीणों को आवास प्रदान करती है। इस योजना का उद्देश्य पूरे देश के गरीब लोगों को 20 लाख आवास प्रदान करना है और जिनमें 65% लाभार्थी ग्रामीण इलाकों के हैं। इस योजना के अनुसार, जो लोग अपना घर बनवाने में सक्षम नहीं हैं, उन लोगों की सहायता करने के लिए सब्सिडी वाले ऋण प्रदान किए जाते हैं। इस योजना को मूल रूप से वर्ष 1985 में शुरू किया गया था और फिर वर्ष 1998 से वर्ष 1999 में इसका नवीनीकरण किया गया था।

एकीकृत ग्रामीण विकास योजनाएं (आईआरडीपी)

एकीकृत ग्रामीण विकास योजना को दुनिया में अपनी तरह की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक माना जाता है। यह योजना भारत में सबसे गरीब लोगों के लिए आय की कमी से उत्पन्न परेशानियों के निवारण के लिए और संपत्तियाँ प्रदान करने के लिए बनाई गई है। यह योजना चयनित स्थानों पर वर्ष 1978 से वर्ष 1979 में शुरू की गई थी। हालांकि, नवंबर 1980 तक पूरा देश इस योजना के दायरे में आ गया था। इस योजना का मुख्य उद्देश्य स्थाई संपत्ति बनाना और उन्हें लक्षित परिवारों को प्रदान करना है, ताकि उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर लाया जा सके। इस योजना के तहत प्रदान की जाने वाली स्व-रोजगार योजना इसका एक प्रमुख घटक है।

भारत में गरीबी उन्मूलन के लिए भारत सरकार द्वारा शुरू की गई कुछ अन्य योजनाएं निम्न हैं:

अन्नपूर्णा योजना

राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (एनआरईपी)

राष्ट्रीय मातृत्व लाभ योजना (एनएमबीएस)

ग्रामीण श्रम रोजगार गारंटी योजना (आरएलईजीपी)

राष्ट्रीय परिवार लाभ योजना (एनएफबीएस)

टीआरवाईएसईएम योजना

राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना (एनओएपीएस)

जवाहर रोजगार योजना (जेआरवाई)

बंधुआ मुक्ति मोर्चा

स्वर्ण जयंती ग्राम स्वरोजगार योजना

संपत्ति के केंद्रीकरण को रोकने के लिए कानून का संशोधन करना

राष्ट्रीय सामाजिक सहायता योजना (एनएसएपी)

अंत्योदय योजना

ग्रामीण आवास योजना

लघु किसान विकास योजना (एसएफडीपी)

प्रधानमंत्री रोजगार योजना

सूखा क्षेत्र विकास योजना (डीएडीपी)

नेहरू रोजगार योजना (एनआरवाई)

बीस अंकीय योजना

शहरी गरीबों के लिए स्वयं रोजगार योजना (एसईपीयूपी)

कार्य योजना के लिए भोजन

प्रधानमंत्री की एकीकृत शहरी गरीबी उन्मूलन योजना (पीएमआईयूपीईपी)

न्यूनतम आवश्यकता योजना (एमएनपीे आधार पर तय गरीबी रेखा के आधार पर जो गरीब आबादी निकलेगी वह कुल आबादी के 50 फीसदी से कम रहेगी।

 

योजना आयोग ने 2004-05 में 27.5 प्रतिशत गरीबी मानते हुए योजनाएं बनाई थी। फिर इसी आयोग ने इसी अवधि में गरीबी की तादाद आंकने की विधि की पुनर्समीक्षा के लिए एक विशेषज्ञ समूह का गठन किया था, जिसने पाया कि गरीबी तो इससे कहीं ज्यादा 37.2 प्रतिशत थी। इसका मतलब यह हुआ कि मात्र आंकड़ों के दायें-बायें करने मात्र से ही 100 मिलियन लोग गरीबी रेखा में शुमार हो गए।

अगर हम गरीबी की पैमाइश के अंतरराष्ट्रीय पैमानों की बात करें, जिसके तहत रोजना 1.25 अमेरिकी डॉलर (लगभग 60 रुपये) खर्च कर सकने वाला व्यक्ति गरीब है तो अपने देश में 456 मिलियन (लगभग 45 करोड़ 60 लाख) से ज्यादा लोग गरीब हैं।

अब सोचने वाली बात है कि जिन नेताओं ने गरीबी दूर करने के लिए इतनी सारी योजनाएँ चलायी फिर भी गरीबी बढती ही जा रही है परंतु  नेताओं के लिए कोई भी योजना नही चलती फिर भी उनकी संपत्ति दिन दुनी रात चौगुनी बढती जा रही है ।ऐसी परिस्थिति हमें यह सोचने के लिए विवश कर देती है क्या ये सारी योजनाएँ वास्तव में गरीबी मिटाने के लिए है या नेताओं की संपत्ति बढाने के लिए है ।जिस विधि से इन नेताओं की संपत्ति बढती है वही विधि अपनाकर गरीबों की गरीबी आखिर क्यों नही दूर किया जाता है ? क्या संपत्ति बढाने की इस विधि को नेताओं ने अपने नाम पेटेंट करा लिया है ?

 

 

भारत में गरीबी एवम् नेतााओं का अन्योनाश्रय संबंध है ।ऐसे लगता है जैसे एक दूजे के बीन इन दोनों का अस्तीत्व संभव नही है ।गरीबी वह पोषक पौधा है जिस पर अमरलता रुपी नेता फैलता और फूलता है । अगर गरीब की आमदनी घटेगी तो इन नेताओं की आमदनी बढेगी यानी दोनों के बीच व्युतक्रमानुपाती संबंध है ।ऐसी परिस्थति में कौन नेता कालीदास बनेगा जो उसी डाल को काटेगा जिस पर वह खुद बैठा हुआ है ?ये तो गरीबों की गलती है कि वह यह सोच बैठता है कि कालीदास सरीखे कोई न कोई नेता आयेगा जो उसी डाल को काटेग जिस पर वह खुद बैठा है ।गत आम चुनाव 2014 में लोगों को लगा कि कालीदास सरीखे एक नेत आया है जो गरीबी तो दूर करेगा ही एवम् उस डाल को ही नहीं काटेगा जिस पर वह खुद बैठा है अपितु उस पेङ को ही समूल नष्ट कर  डालेगा जिस पर वह खुद बैठा है ।परिणामत: उस नेता की पार्टी को भारी बहुमत से लोगों ने जीताया ।पर अब अगला आम चुनाव होने वाला है पर गरीब का सपना हो न सका अपना ।

भारत को आजाद हुए 70 साल से भी अघिक हो गये पर जितनी गरीबी स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले थी आज उससे भी अधिक है ।परंतु आश्चर्य की बात है कि भारत में जितने भी नेता हुए उनकी संपति की वृद्धि इतनी हो गयी कि पुस्त दर पुस्त संपति का भोग करने के बाद भी संपति खत्म होने का नाम ही नहीं लेती ।वास्तव में गरीबी बढ़ा रहा है पूँजी का केन्द्रीयकरण । दावोस बैठक के पूर्व ही आँक्सफैम जो गरीबी उन्मूलन के लिए काम करता है ,ने सर्वे कर यह प्रकाशित किया कि देश का 73% आमदनी मात्र 1% अमीरों के पास है ।देश के 67 करोड़ लोगों की आय में महज 1% की वृद्धि हुईं  है जबकि अमीरों की आय में 20.9 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुईं है जो कि देश के वार्षिक बजट के बराबर है ।इस असमानता के कारण भारत में 2016 में अरबपतियों की संख्या 84 थीं  से बढकर 2017 में 101 हो गयी । 2016 मे देश के 1%अमीरों के पास देश की आमदनी का 58% हिस्सा था जबकि वैश्विक अनुपात 50% था ।2017 में यह वैश्विक अनुपात 82% है और विश्व की 3.7अरब की आधी आबादी की आमदनी में कोई वृद्धि ही नहीं  हुई । वस्त्र उद्योग में लगे भारतीय मजदूर को उसी उद्योग में लगे शीर्ष अधिकारी के बराबर वेतन पाने में उसे कम से कम 941 वर्ष लगेगें  । इसिलिए सर्वेकर्ता ने यह सुझाव दिया कि भारत ,अमेरिका और ब्रिटेन जैसे  देशों को अपने अधिनस्थ कार्यपालक पदाधिकारियों के वेतन 60% कम किये जाँय । पर अफसोस की बात है कि जनप्रतिनिधियों का वेतन मनोनुकूल बढता ही जा रहा है ।उच्च पदस्थ पदाधिकारियोंं का वेतन निम्नवर्गीय कर्मचारियों की तुलना में  कई गुणा अधिक है जो इस असमानता की खाई को और अधिक बडाता है ।इन सारे सुझावों को अमल में लाने का दायित्व उन्हीं नेताओं पर है जिनकी आमदनी रातों रात भादों माह की नदियों की तरह उफान मारने लगती है । इसिलिए शिर्षक का नाम “गरीबी ” नेताओं की पूँजी रखा गया है ।

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समझौता

हूल दिवस




हिन्दी का एक छोटा सा शब्द समझौता जिसे जानते तो सभी है पर हमारे जीवन पर इसका प्रभाव कितना बङा है इससे अनभिज्ञ बहुत लोग हैं ।जो लोग समझौते से वाकिफ हैं उसमें से भी प्रायः लोग इसके प्रभाव को नजरअंदाज कर निकल जाते हैं ।जिन्दगी के हर मोङ  पर कभी समझौता कर आगे बढ जाता है इनसान तो कभी बिन समझौता किये भी इनसान आगे बढ़ जाता है ।इनसान जन्म के बाद से ही समझौता करना या नही करना सीख जाता है और इनसान को यह पता भी नहीं चलता कि कब वह समझौता किया और कब नही किया ।लोग समझौता करके सफलताओं की बुलंदियों तक पहुँच जाते हैं तो कई लोग समझौता किए बिना भी सफलताओं की बुलंदियों को पार कर जाते हैं ।इनसान तो इनसान है कई संस्थायें जिन्हें कानूनी रुप से इनसान का दर्जा प्राप्त है वो भी कभी समझौता करके तो कभी नही करके सफलताओं की बुलंदियों  को प्राप्त कर चुके हैं ।उत्तर कोरिया की चर्चा हर जगह होती है कि उसने अपने से कई गुणा ताकतवर देश अमेरिका को भी तबाह करने की क्षमता रखता है और इस क्षमता को विकसित करने के लिए उसने किसी से समझौता नहीं किया  ।इसी तरह हमारा देश भारत अपने हितों को ध्यान में रखकर कई देशों से समझौता कर सफलताओं की सीढियाँ पर चढना चाहता है ।

समझौता दो या दो से अधिक व्यक्तियों /कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त संस्थाओं के बीच आपसी सहमति के आधार पर किया जाता है जो कानूनी रुप से समझौते में शामिल सभी पक्षकारों के लिए बाध्यकारी होता है ।कोई भी पक्षकार जो समझौते में शामिल है और समझौते में वर्णित बिन्दुओं को मानने से इन्कार करता है तो अन्य पक्षकार समझौता न मानने वाले के विरुद्ध न्यायालय जा सकता है और समझौते के बिन्दुओं को मानने के लिए बाध्य कर सकता है ।

हाल ही में समपन्न हुए IPL के मैचों में क्रिस गेल जैसे खिलाङी से कोई समझौता करने को तैयार नहीं था और अंत में किंग एलेवन पंजाब से क्रिस गेल का समझौता हुआ ।क्रिस गेल ने लीग मैचों में अपना जलवा दीखते हुए किंग एलेवन पंजाब को टाँप  चार टीमों बनाए रखा ।लेकिन ज्योंहि गेल का बल्ला खामोश होने लगा के एल राहुल जैसे बल्लेबाज भी टीम को टाँप चार टीमों में नहीं पहुचा सके और इस बार भी किंग एलेवन पंजाब की टीम अन्य सालों की भाँति नीचले पायदान पर रही ।

इसी तरह हाल ही में कर्नाटक विधान सभा का चुनाव हुआ जिसमें राज्य की तीनो बङी पार्टियों क्रमशः भाजपा ,काँग्रेस और जनता दल सेक्युलर को क्रमशः 104;78 और 38 सीटें प्राप्त हुई । राज्यपाल ने भाजपा को सरकार बनाने का न्योता दिया । काँग्रेस राज्यपाल के फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट गयी । सुप्रीम कोर्ट ने बहुमत  साबित करने के लिए दिये गये 15दिन के समय को घटाकर एक दिन का वक्त दिया ।भाजपा को किसी भी पार्टी से समझौता नही होने के कारण सरकार गंवानी पङी वहीं काँग्रेस और जनता दल सेक्युलर के आपसी समझौता के कारण कुमारस्वामी कर्नाटक के मुख्य मंत्री के पद पर विद्यमान हैं जबकि उनके पास मात्र 38 विधायक ही हैं ।

कभी कभी समझौताा के परिणाम समझौता के पक्षकार न होने के बावजूद भी भुगतना पङता है ।हम सभी जानते हैं कि शादी पति और पत्नी के बीच कियाा गया समझौता है ।जबतक समझौता सही दिशा में चलता है तबतक ही दोनों का आपसी अन्तरंग सम्बंध चलता है ।इसी क्रम में बच्चे पैदा हो जाते हैं ।लेकिन पति पत्नी का सम्बंध जब विच्छेद हो जाता है तो बच्चे को भी परिणाम भुगतना पङता है ।

आज दिनांक 6.6.2018 को भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जिनकी पार्टी 22-23 राज्यों में शासन कर रही है ,उद्धव ठाकरे से मिलने श्री ठाकरे के निवास मातोश्री पहुँचेे ।सोचिये जिनकी पार्टी की सरकार पूरे देश पर और कई प्रदेशोंं में शासन कर रही है और भारत की सबसे बङी पार्टी है ।उस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष एक क्षेत्रीय पार्टी शिव सेना के अध्यक्ष से मिलने उनके निवास तक पहुंच रहे हैं और अघोषित समझौता करते हैं आखिर क्यों ? इस समझौते की बारीकियों को समझने के लिए भारत के राजनीतिक परिदृश्य को जानना आवश्यक है । एक तो सारे विपक्ष का महागठबंधन जो आहिस्ता आहिस्ता साकार हो रहा है तो दुसरी तरफ भाजपा के पुराने सहयोगी टीडीपी भाजपा से नाता तोड़ चुकी है ।वहीं जदयू बिहार में अपने को बङा भाई घोषित कर चुका है जिसे बिहार भाजपा की ईकाई ने मान भी लिया है ।लोजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष आरक्षण के बहाने कङवी वाणी बोलते हैं तो कभी यूपी के राजभर जहर उगलते हैं । ऐसे में 2019 के चुनाव में  सत्ता जाने का डर अभी से सताने लगा है ।इसीलिए भारत के सबसे बङी पार्टी के अध्यक्ष को एक क्षेत्रीय पार्टी शिव सेना के अध्यक्ष के घर जाकर मिलना पङता है ।इसमे भाजपा का भविष्य उज्जवल दिखाई देता है इसलिए उद्धव ठाकरे के घर जाकर अघोषित समझौता कर रहे हैं ।ठीक इसी तरह 2014 में भी हुआ था ।ठाकरे चार साल भाजपा के दरवाजे ठक ठकाते रहे और भाजपा दरवाजे तक नहीं खोली ।भाजपा फिर चुनावी फायदा उठायेगी और चार साल सो जायेगी ।शिव सेना प्रमुख को तत्कालिक फायदा न देखकर दीर्घकालिक नीति अपनानी चाहिए और अपनी छवि सुधारने के लिए कम से कम 2019 का चुनाव स्वतंत्र रुप से लङना चाहिए ताकि भाजपा को यह समझ में आये कि शिव सेना को जितना नुकसान 2019 में होगा उससे कई गुणा अधिक नुकसान भाजपा को होगा ।इसलिए यह समझौता शिव सेना को नही करना चाहिए ।

 

 

 

रामनवमी

आज भगवान श्री राम का जन्म उत्सव पूरा भारत मना रहा है ।जरुरत है कि अब श्री राम का जन्म उत्सव पूरे विश्व में मनाया जाय और इसके लिए पूरे विश्व को प्रेरित किया जाय

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विलुप्त होती गौरैया

चू चू करती जिन गौरैयों की आवाज कभी आँगन में सुबह शाम सुनाई देती थी आज उसी आँगन में बच्चे अपनी माँ से पुछते हैं कि माँ मुझे गौरैया कब दिखाओगी तो माँ कहती है कि गौरैया आते ही दिखा दूँगी ।आखिर बच्चे को गौरैया देखने से वंचित करने वाले कौन लोग हैं ?हम ,आप या समाज या कोई और ।आखिर कौन?

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होली और योगी

 

फाल्गुन का महीना आते ही ये मिजाज़ होलियाना हो जाता है ।बच्चे ,बुढे,जवान ,स्त्री ,पुरुष सबों में रंगों के पर्व का उल्लास छा जाता है ।सभी लोग एक दुसरे से बतियाना ,गपियाना चाहते हैं और ये कहना चाहते हैं कि “आज रपट जाँय तो हमें ना छोङैयो ” ।आश्चर्य कि बात तो ये है कि योगी भी होली के रंग मे रंग गये हैं और मथुरा के बरसाने में लठमार होली खेल रहे हैं और वो भी ब्रज की बालाओं के साथ नहीं बल्कि बालीवुड की मशहूर अदाकारा हेमा मालिनी के साथ ।अब इसे क्या कहेंगे ?कुछ भी तो नही ।नही !नही !ये तो कहना ही पङेगा कि “दिल है कि मानता नही ” ।फागुन का महीना हो और इठलाती ,बलखाती कोई भी हसीना हो तो किसी का भी दिल तो मचलेगा ही और जहाँ शोले की बसंती हो तो गब्बर तो गब्बर है योगी भी योग तोड़ लठमार होली खेल रहे हैं और बसंती से ये वादा करते नजर आये कि बसंती “बरसाने के इस होली ( 2018) को मै अन्तरराष्ट्रीय पहचान दिलाऊँगा “।बेचारा योगी की होली हो या बरसाने की होली हो वो भारत में पहचान का मोहताज नही है ।हाँ मगर योगी के होली खेलने से बरसाने की होली को अन्तरराष्ट्रीय पहचान मिले तो बङी बात होगी ।

मकर संक्रांति

मकर संक्रांति मकर संक्रांति का पर्व हिन्दुस्तान में सदियों से मनाया जाता है ।वैसे तो भारत में पर्वो  की गणना चंद्र आधारित कैलेंडर पर की जाती है और एक मात्र भारतीय पर्व मकर संक्रांति ही है जिसकी गणना सूर्य आधारित कैलेंडर पर की जाती ।इस कैलेंडर की गणना में अशुद्धियों की गुंजाइश नगण्य होती है ।इसीलिए मकर संक्रांति प्रत्येक साल 14 जनवरी को ही पङता है ।हालांकि मकर संक्रांति की तिथि में भी अंतर आता है जिसकी चर्चा हम पीछे करेंगे ।इस पर्व को भिन्न भिन्न प्रदेशों में भिन्न भिन्न नामों से जाना जाता है जैसे ‘तिल संक्रांति’, ‘खिचड़ी पर्व ।
इस दिन कहीं खिचड़ी तो कहीं ‘चूड़ादही’ का भोजन किया जाता है तथा तिल के लड्डू बनाये जाते हैं। ये लड्डू मित्र व सगे सम्बन्धियों में बाँटें भी जाते हैं।
मकर संक्रान्ति के दिन से सूर्य उत्तरायण होता है, जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर मुड़ जाता है। परम्परा से यह विश्वास किया जाता है कि इसी दिन सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है। यह वैदिक उत्सव है। इस दिन खिचड़ी का भोग लगाया जाता है। गुड़–तिल, रेवड़ी, गजक का प्रसाद बाँटा जाता है। इस त्यौहार का सम्बन्ध प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और कृषि से है। ये तीनों चीज़ें ही जीवन का आधार हैं। प्रकृति के कारक के तौर पर इस पर्व में सूर्य देव को पूजा जाता है, जिन्हें शास्त्रों में भौतिक एवं अभौतिक तत्वों की आत्मा कहा गया है। इन्हीं की स्थिति के अनुसार ऋतु परिवर्तन होता है और धरती अनाज उत्पन्न करती है, जिससे जीव समुदाय का भरण-पोषण होता है। यह एक अति महत्त्वपूर्ण धार्मिक कृत्य एवं उत्सव है ।                                 तिल संक्राति

देश भर में लोग मकर संक्रांति के पर्व पर अलग-अलग रूपों में तिल, चावल, उड़द की दाल एवं गुड़ का सेवन करते हैं। इन सभी सामग्रियों में सबसे ज़्यादा महत्व तिल का दिया गया है। इस दिन कुछ अन्य चीज़ भले ही न खाई जाएँ, किन्तु किसी न किसी रूप में तिल अवश्य खाना चाहिए। इस दिन तिल के महत्व के कारण मकर संक्रांति पर्व को “तिल संक्राति” के नाम से भी पुकारा जाता है। तिल के गोल-गोल लड्डू इस दिन बनाए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के शरीर से हुई है तथा उपरोक्त उत्पादों का प्रयोग सभी प्रकार के पापों से मुक्त करता है; गर्मी देता है और शरीर को निरोग रखता है। मंकर संक्रांति में जिन चीज़ों को खाने में शामिलकिया जाता है, वह पौष्टिक होने के साथ ही साथ शरीर को गर्म रखने वाले पदार्थ भी हैं।
जितने समय में पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक चक्कर लगाती है, उस अवधि को “सौर वर्ष” कहते हैं। पृथ्वी का गोलाई में सूर्य के चारों ओर घूमना “क्रान्तिचक्र” कहलाता है। इस परिधि चक्र को बाँटकर बारह राशियाँ बनी हैं। सूर्य का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना “संक्रान्ति” कहलाता है। इसी प्रकार सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने को “मकर संक्रान्ति” कहते हैं।
सूर्य का मकर रेखा से उत्तरी कर्क रेखा की ओर जाना ‘उत्तरायण’ तथा कर्क रेखा से दक्षिणी मकर रेखा की ओर जाना ‘दक्षिणायन’ है। उत्तरायण में दिन बड़े हो जाते हैं तथा रातें छोटी होने लगती हैं। दक्षिणायन में ठीक इसके विपरीत होता है। शास्त्रों के अनुसार उत्तरायण देवताओं का दिन तथा दक्षिणायन देवताओं की रात होती है। वैदिक काल में उत्तरायण को देवयान तथा दक्षिणायन को पितृयान कहा जाता था। मकर संक्रान्ति के दिन यज्ञ में दिये हव्य को ग्रहण करने के लिए देवता धरती पर अवतरित होते हैं। इसी मार्ग से पुण्यात्माएँ शरीर छोड़कर स्वर्ग आदि लोकों में प्रवेश करती हैं। इसलिए यह आलोक का अवसर माना जाता है। इस दिन पुण्य, दान, जप तथा धार्मिक अनुष्ठानों का अनन्य महत्त्व है और सौ गुणा फलदायी होकर प्राप्त होता है।

 

              खिचड़ी संक्रान्ति
चावल व मूंग की दाल को पकाकर खिचड़ी बनाई जाती है। इस दिन खिचड़ी खाने का प्रचलन व विधान है। घी व मसालों में पकी खिचड़ी स्वादिष्ट, पाचक व ऊर्जा से भरपूर होती है। इस दिन से शरद ऋतु क्षीण होनी प्रारम्भ हो जाती है। बसन्त के आगमन से स्वास्थ्य का विकास होना प्रारम्भ होता है। इस दिन गंगा नदी में स्नान व सूर्योपासना के बाद ब्राह्मणों को गुड़, चावल और तिल का दान भी अति श्रेष्ठ माना गया है। महाराष्ट्र में ऐसा माना जाता है कि मकर संक्रान्ति से सूर्य की गति तिल–तिल बढ़ती है, इसीलिए इस दिन तिल के विभिन्न मिष्ठान बनाकर एक–दूसरे का वितरित करते हुए शुभ कामनाएँ देकर यह त्योहार मनाया जाता है।
पवित्र गंगा में नहाना व सूर्य उपासना संक्रान्ति के दिन अत्यन्त पवित्र कर्म माने गए हैं। संक्रान्ति के पावन अवसर पर हज़ारों लोग इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम, वाराणसी में गंगाघाट, हरियाणा में कुरुक्षेत्र, राजस्थान में पुष्कर, महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी में स्नान करते हैं। गुड़ व श्वेत तिल के पकवान सूर्य को अर्पित कर सभी में बाँटें जाते हैं। गंगासागर में पवित्र स्नान के लिए इन दिनों श्रद्धालुओं की एक बड़ी भीड़ उमड़ पड़ती है ।
     

 मकर संक्रांति की तिथियों पर एक नज़र 
सन 2012 में मकर संक्रांति 15 जनवरी यानी रविवार की थी। राजा हर्षवर्द्धन के समय में यह पर्व 24 दिसम्बर को पड़ा था। मुग़ल बादशाह अकबर के शासन काल में 10 जनवरी को मकर संक्रांति थी। शिवाजी के जीवन काल में यह त्योहार 11 जनवरी को पड़ा था।इसी तरह के कुछ अन्य उदाहरण हैं जिसमें मकर संक्रांति की तिथि एवं ,समय के साथ अवधि भी बताया गया है जैसे -1849 में मकर संक्रांति 12जनवरी शुक्रवार को 7.38–12.59तक था जबकि संक्रांति समय 6.09 था ।1850में भी मकर संक्रांति 12 जनवरी शनिवार को 12.15-18.19 था और संक्रांति समय 12.15 था ।1900 में मकर संक्रांति 13जनवरी शनिवार ,1956को 14जनवरी शनिवार तथा 1960 में 14जनवरी वृहस्पतिवार को पङा था ।आखिर ऐसा क्यों?इसे समझने के  गलिए नीचे दिये गये तस्वीर को ध्यान से देखें ।

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Approximate Month Zodiac Rashi Animal
1 April- Aries -Mesha Ram
2 May -Taurus -Vrishabh Bull
3 June- Gemini -Mithuna Couple
4 July -Cancer -Karkata Crab
5 August -Leo -Simha Lion
6 September -Virgo -Kanya Virgin
7 October -Libra -Tula Balance
8 November -Scorpio- Vrischika Scorpion
9 December -Sagittarius -Dhanush Bow
10 January -Capricorn Makara -Alligator
11 February- Aquarius -Kumbha Pot
12 March Pisces

सूर्य के धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करने को ‘मकर संक्रांति’ कहा जाता है। दरअसल हर साल सूर्य का धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश 20 मिनट की देरी से होता है । वास्तव में सूर्य आधारित कैलेंडर में पृथ्वी को सूर्य का एक वार परिक्रमा करने में 365.256363004 दिन लगता है जबकि सभी प्रकार की गणनाओं में 365 दिन 5 घंटा 49 मिनट 12 सेकंड मानकर गणना  की जाती है ।इस तरह 365.256363004 दिन को सेकंड में परिवर्तित करते हैं तो   31558149 ;सेकंड होता है जबकि 365 दिन 5घंटा 49मिनट 12सेकंड को सेकंड में परिवर्तित करते हैं तो  31556952सेकंड होता  है ।इस तरह 31558149-31556952=1197 सेकंड काा अंतर आता है जो लगभा 20 मिनट होता है ।

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इस तरह हर तीन साल के बाद सूर्य एक घंटे बाद और हर 72 साल में एक दिन की देरी से मकर राशि में प्रवेश करता है। इसलिए एक माह देरी से मकर राशि में प्रवेश करने में 1/20x30x24x60 =2160लगेगा । इसी तरह  1728 (72 गुणा 24) साल में फिर सूर्य का मकर राशि में प्रवेश एक दिन की देरी से होगा और इस तरह 2080 के बाद ‘मकर संक्रांति’ 15 जनवरी को पड़ेगी।

विभिन्न राज्यों में मकर संक्रांति का त्योहार भिन्न भिन्न रुपों में मनाया जाता है । इलाहाबाद में यह पर्व माघ मेले के नाम से जाना जाता है. 14 जनवरी से इलाहाबाद मे हर साल माघ मेले की शुरुआत होती है. 14 दिसम्बर से 14 जनवरी का समय खर मास के नाम से जाना जाता है. और उत्तर भारत मे तो पहले इस एक महीने मे किसी भी अच्छे कार्य को अंजाम नही दिया जाता था. मसलन विवाह आदि मंगल कार्य नहीं किए जाते थे पर अब तो समय के साथ लोग काफ़ी बदल गए है. 14 जनवरी यानी मकर संक्रान्ति से अच्छे दिनों की शुरुआत होती है. समूचे उत्तर प्रदेश में इस व्रत को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है और इस दिन खिचड़ी सेवन एवं खिचड़ी दान का अत्यधिक महत्व होता है. इलाहाबाद में गंगा, यमुना व सरस्वती के संगम पर प्रत्येक वर्ष एक माह तक माघ मेला लगती है ।

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पंजाब में इसे ‘लोहड़ी’ कहते हैं जो ग्रामीण क्षेत्रों में नई फ़सल की कटाई के अवसर पर मनाया जाता है। पुरुष और स्त्रियाँ गाँव के चौक पर उत्सवाग्नि के चारों ओर परम्परागत वेशभूषा में लोकप्रिय नृत्य भांगड़ा का प्रदर्शन करते हैं। स्त्रियाँ इस अवसर पर अपनी हथेलियों और पाँवों पर आकर्षक आकृतियों में मेहंदी रचाती हैं।

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पश्चिम बंगाल में मकर सक्रांति के दिन देश भर के तीर्थयात्री गंगासागर द्वीप पर एकत्र होते हैं, जहाँ गंगा बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। एक धार्मिक मेला, जिसे ‘गंगासागर मेला’ कहते हैं, इस समारोह की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इस संगम पर डुबकी लगाने से सारा पाप धुल जाता है। बंगाल में इस पर्व पर स्नान पश्चात् तिल दान करने की प्रथा है. यहां गंगासागर में हर साल विशाल मेला लगता है. मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भगीरथ के पीछे-पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं. मान्यता यह भी है कि इस दिन यशोदा जी ने श्रीकृष्ण को प्राप्त करने के लिए व्रत किया था. इस दिन गंगा सागर में स्नान-दान के लिए लाखों लोगों की भीड़ होती है. लोग कष्ट उठाकर गंगा सागर की यात्रा करते हैं.

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गुजरात का क्षितिज भी संक्रान्ति के अवसर पर रंगबिरंगी पंतगों से भरा रहता है ।लोग पतंगबाजी का आनंद लेते हैं ।

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तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाया जाता है.पहले दिन भोगी-पोंगल, दूसरे दिन सूर्य-पोंगल, तीसरे दिन मट्टू-पोंगल अथवा केनू-पोंगल, चौथे व अंतिम दिन कन्या-पोंगल. इस प्रकार पहले दिन कूड़ा करकट इकट्ठा कर जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है. पोंगल मनाने के लिए स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनाई जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं. इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाया जाता है. उसके बाद खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं.

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असम में मकर संक्रांति को माघ-बिहू या भोगाली-बिहू के नाम से मनाते हैं. राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद लेती हैं. ।

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झारखंड में मकर संक्रांति का त्योहार वैसे ही मनाया जाता है जैसे बिहार में मनाया जाता है ।लेकिन झारखंड के कुछ जिलोँ में टुसू पर्व के रुप मे मनाया जाता है ।इसी  तरह संथाल परगना में सोहराय पर्व मनाया जाता है ।

 

 

नोटबंदी-पहली सालगिरह

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आठ नवंबर दो हजार सोलह को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी ने एक हजार और पाँच सौ मूल्य के रुपयों को गैरकानूनी घोषित कर प्रचलन से बाहर करने की घोषणा की थी ।इस तरह आठ नवम्बर दो हजार सत्रह को नोटबंदी की पहली सालगिरह है ।सालगिरह मनाने की तैयारी भी सरकार की तरफ से चल रही है ।सरकार के मुखिया स्वयं प्रधानमंत्री के अलावे उनके मंत्रीपरिषद के सदस्य भी नोटबंदी की पहली सालगिरह को यादगार बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं ।दुसरी तरफ विपक्षी पार्टी भी पहली सालगिरह को अपने अंदाज मे यादगार बनाने की कोशिश कर रही। विपक्षी पार्टियाँ इसे काला दिवस के रुप में मनाने की तैयारी कर रही है ।आखिर नोटबंदी के जन्म दिन को विवाद में क्यों घसीटा जा रहा है ? इस विवाद को समझने के लिए कुछ तस्वीरो पर नजर डालते हैं  :-

सालगिरह मनाने से पूर्व यह जानना अतिआवश्यक है कि एक  हजार एवं पाँच सौ  मूल्य के प्रचलित रुपयों को बंद करते समय  मोदी ने नोटबंदी के कौन कौन से कारण बताये थे ।नोटबंदी के कारणों को जानकर सालगिरह मनाने  का  कुछ अलग ही मजा है ।नोटबंदी के प्रमुख कारणों में से सबसे बङा कारण कालाधन को समाप्त करना , आतंकवाद पर नियंत्रण करना ,जाली नोटों को बंद करना,भ्ररष्टाचार पर रोक लगाना ,गरीबों का सशक्तिकरण आदि ।

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नोटबंदी की घोषणा के तुरत बाद से ही नोटबंदी के दुष्परिणाम सामने आने लगे ।

उस समय के कुछ महत्पूर्ण समाचारपत्र ,पत्रिकाओं पर एक नजर डालना बेहद ही जरुरी है ।

News18 India

नोटबंदी से भारतीय अर्थव्यवस्था संकटपूर्ण दौर में : न्यूयॉर्क टाइम्ससर

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Here are the 105 people who died in 45 days of demonetisation SHILPA SHAJI Updated On:  22 Dec 2016

 

India’s Demonetisation Kills 100 People Apparently – This Is Not An Important Number

Tim Worstall, CONTRIBUTOR

  16,451 

 

11 Bank N Have Died In Last 12 Days Due To Demonetization Related Stress, But Do We Care?

‘Corrupt bankers undermining demonetisation’

Deposits in Jan Dhan accounts rise to Rs 64,250 crore

PTI | Updated: Nov 25, 2016, 18:28 IST
PTI

Post demonetisation bank data reveals 5,800 companies with 13,140 suspicious accounts

RBI को नहीं पता नोटबंदी के बाद कितना कालाधन समाप्त हुआ

पीटीआई | Updated Sep 4, 2017, 09:02 PM IST

नोटबंदी से कितना कालाधन खत्म हुआ, इसकी कोई जानकारी नहीं: रिजर्व बैंक

एजेंसीLast Updated:
Monday, 4 September 2017 11:10 PM

नोटबंदी का असर अनुमान के मुताबिक, काला धन पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ: अरुण जेटली

Thu, 31 Aug 2017-5:55 pm,
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नोटबंदी से कालाधन, भ्रष्टाचार एवं आतंकवाद नहीं रका, उल्टा आम जनता हुई परेशान : सुहासिनी

Updated Jan 28, 2017, 03:25 PM IST

Friday, June 03, 2016

India’s GDP growth 5.2% in 2015-16 against 7.1% in 2014-15, thanks to discripancies: Top consultants CMIE

India growth slows to 7.1% in 2016-17 as demonetisation hits consumption

Demonetisation Impact

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आरबीआई ने जारी किए नोटबंदी के आंकड़े, बंद हुए 1000 रुपये के 99 फीसदी नोट लौटे

नवभारतटाइम्स.कॉम | Updated Aug 30, 2017, 09:47 PM IST
नई दिल्ली
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने वार्षिक रिपोर्ट 2016-17 को जारी किया है। इस रिपोर्ट में नोटबंदी के बाद मार्च 2017 तक की स्थिति की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक नोटबंदी के दौरान बैन किए गए 1000 रुपये के पुराने नोटों में से करीब 99 फीसदी बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट आए हैं। 1000 रुपये के 8.9 करोड़ नोट (1.3 फीसदी) नहीं लौटे हैं। पिछले साल नवंबर में लागू की गई नोटबंदी के दौरान देश में प्रचलन में रहे 15.44 लाख करोड़ रुपये के प्रतिबंधित नोट में से 15.28 लाख करोड़ रुपये बैंकिंग सिस्टम में वापस लौट कर आ गए हैं।नोटबंदी से पहले 1000 रुपये के नोटों की कुल संख्या 632.6 करोड़ थी। यानी सर्कुलेशन में 1000 रुपके के नोटों की टोटल वैल्यू 6326 अरब रुपये थी। इसमें से केवल 89 अरब वैल्यू के नोट नहीं लौटे हैं। नोटबंदी के बाद सर्कुलेशन में मौजूद नोटों के टोटल वैल्यू में 2000 रुपये के नए नोट की हिस्सेदारी 50.2 फीसदी है।

रिजर्व बैंक ने कहा कि नोटबंदी के बाद नये नोटों की छपाई से वर्ष 2016-17 में नोटों की छपाई की लागत दोगुनी होकर 7,965 करोड़ रुपये हो गई जो 2015-16 में 3,421 करोड़ रुपये थी। नोटबंदी के बाद बैंकिंग सिस्टम में नोटों का सर्कुलेशन 20.2 फीसदी (YoY) घटा है। इस साल सर्कुलेशन में नोटों की वैल्यू 13.1 लाख करोड़ है जबकि पिछले साल (मार्च) यह 16.4 लाख करोड़ थी।

2000, 500 रुपये की नई डिजाइन के भी नकली नोट पकड़े गए
आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक बैंकिंग सिस्टम में मार्च 2017 तक 7,62,072 नकली नोट पकड़े गए। सबसे बड़ी चिंता की बात 2000 और 500 रुपये की नई डिजाइन के भी नकली नोटों के सामने आने की है। आरबीआई के मुताबिक 2000 रुपये के नोट की नई डिजाइन के 638, और 500 रुपये के नोट की नई डिजाइन के 199 नकली नोट पकड़े गए।

आरबीआई के आंकड़े।

कांग्रेस ने बोला हमला, कहा नोटबंदी शर्मनाक
नोटबंदी के बाद करीब-करीब सारा पैसा बैंकिंग सिस्टम में वापस आ गया है। कांग्रेस ने इसे लेकर केंद्र पर हमला बोला है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और यूपीए सरकार में वित्त मंत्री रह चुके पी चिदंबरम ने ट्वीट कर सरकार पर निशाना साधा है। चिदंबरम ने अपने ट्वीट में लिखा है कि नोटबंदी के बाद 15,44,000 करोड़ के नोटों में से केवल 16000 करोड़ नोट नहीं लौटे। यह एक फीसदी है। नोटबंदी की अनुशंसा करने वाले RBI के लिए यह शर्मनाक है।

चिदंबरम में और भी ट्वीट कर सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। चिदंबरम ने लिखा है कि 99 फीसदी नोट विधिक तरीके से बदले गए। क्या नोटबंदी की योजना कालेधन को सफेद करने के लिए थी? चिदंबरम ने तंज कसते हुए कहा कि आरबीआई ने 16000 करोड़ रुपये कमाए लेकिन नए नोट छापने में 21000 करोड़ रुपये खर्च कर दिए। ऐसे अर्थशास्त्री को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए।

सरकार ने किया बचाव, गिनाईं उपलब्धियां
नोटबंदी के आंकड़े जारी होने के बाद केंद्र सरकार ने अपने कदम का बचाव किया है। सरकार के सूत्रों ने नोटबंदी की उपलब्धियां गिनवाईं हैं। सूत्रों का कहना है कि इस बार 55 लाख नए करदाता सिस्टम से जुड़े हैं। यह नोटबंदी की वजह से ही संभव हुआ है। सूत्रों ने कहा कि नोटबंदी के बाद 2 लाख से अधिक फर्जी कंपनियां पकड़ी गईं हैं।

 

After growing at a rate of 7% plus continuously for six quarters, India’s GDP growth is set to decelerate in Q3FY17 on account of the NDA government’s demonetization move started on 8thNovember.

While rendering 500 and 1000 rupee notes illegal with immediate effect, the government sets out multiple goals like curbing the menace of black money, counterfeit currency, terrorism funding and push to cashless economy.

Impact on

Informal sector – The good

Agriculture – The bad

Real Estate – The ugly

Impact on informal sect 

In India, formal and informal sector is highly interdependent through forward and backward linkages. Due to the cash crunch created by demonetization and subsequent restrictions on cash withdrawal from banks, there are disruptions in the supply chain. This is a short term scenario and will fade out soon as cash crunch eases.

The more interesting thing to watch out for is the possible change in the cash based business model of informalsector, which has till now helped it in tax avoidance and minimum documentation. Immediately after demonetization, lot of unaccounted money was routed to informal sector and small businesses, old debts and bills were paid back in cash, necessary credit was extended to vendors and suppliers who could not pay back in cash at the moment and digital payments surged.

As the new notes of 500 and 2000 rupees become increasingly available, many businesses may fall back to earlier way of doing business. To that extent economic impact of demonetization will be short term.

However, if the government is able to raise taxes on excessive cash deposits, there will be erosion in the accumulated wealth. Proper implementation of GST, push to digital payments, ban on transactions above Rs.3 lakhs, positive incentives like reduction in corporate tax rate to 25% for companies with annual turnover of 50 crore and income tax rate of 5% for 2.5 to 5 lakh income, can kick start the process of formalization and consolidation of the informal sector. Big players in formal sector can grab this opportunity for acquisitions as well as increasing market share.

Impact on agriculture

Agriculture is worst hit due to demonetization. Harvest from Kharif season had to be sold at nominal prices due to non-availability of cash with wholesalers who buy crop from farmers. Consumer food price index fell by -0.88% in Nov and -1.84% in Dec (m-o-m).

जर्मन अर्थशास्त्री का दावा-अमेरिका के इशारे पर भारत में हुई नोटबंदी!

इक्नॉमिक्स में पी.एचडी कर चुके हेरिंग पेशे से आर्थिक पत्रकार हैं। उन्होंने ये जानकारियां नोटबंदी से जुड़े अपने एक लेख में दी हैं।

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 अब थोङा जानते हैं कि नोटबंदी की घोषणा करते समय मोदी ने जो नोटबंदी के उद्देश्य बताये थे  उन उद्देश्यों को सरकार प्राप्त की या नहीं ।
कालाधन :-यह सर्व विदित सत्य है  कि कालाधन का प्रचलन मुद्रा के रुप में पाँच प्रतिशत है जबकि  कालेधन का प्रतिशत सकल घरेलु उत्पाद का चालीस प्रतिशत है ।इस पाँच प्रतिशत कालेधन को निकालने के लिए सरकार द्वारा उठाया गया कदम यह दर्शाता है कि सरकार की मंशा कालेधन को समाप्त करना नहीं बल्कि एक दिखावा था ।अगर वाक़ई में सरकार की नीयत कालेधन को समाप्त करना होता तो कालाधन जो रियल इस्टेट ,सोना या विदेशों मे जमा है उस पर भी प्रहार होता ।लेकिन वैसा नहीं किया गया जो साबित करता है कि नीयत कालेधन को समाप्त करना नहीं था ।यह सिर्फ और सिर्फ कालेधन के नाम पर लोगों को भ्रमित कर लोकप्रियता हासिल कर उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतना था ।अगर यह मान भी लिया जाय कि सरकार कालाधन समाप्त करना चाहती है तब भी नोटबंदी के निर्णय को सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि मात्र पाँच प्रतिशत कालेधन के लिए सवा सौ करोड़  देशवासियों को बैंकों के आगे कतार में खरा कर देना किसी भी नजर से सही नहीं ठहराया जा सकता ।हाँ मगर राजनीति में मत प्राप्त करने के लिए वैसे मुद्धे जिससे सारा देश त्रस्त हो ,यह जानते हुए भी उठाना  जिसका समाधान नहीं कर सकते फिर भी उठाना , सवा सौ करोड़ देशवासियों के साथ एक सभ्य मजाक है ।
आतंकवाद :-पाकिस्तान की तरफ से आतंकवाद फैलाने का काम बखूबी चल रहा है और पहले से ज्यादा आतंकी हमले वर्तमान में हुए हैं ।जब भी आप टी भी का स्वीच आँन करेंगे तो ब्रेकिंग न्यूज मिलेगा कि आज फिर एक जवान शहीद हो गया ।आज आतंकवादियों ने सेना के कैम्प पर हमला कर दिया ।इसी तरह देश के अन्दर जो उग्रवादी घटनाएँ होती थीं उस पर नियंत्रण नही हो पाया है ।उग्रवादियों के पास भी जो पैसे थे वो भी बैकों मे आ गये ।
जाली नोट :-सरकार ने नोटबंदी की घोषणा करते समय यह विश्वास दिलाया था कि नये पाँच सौ और दो हजार के रुपयों का जाली नोट नहीं बनाया जा सकता है जबकि नोटबंदी के वक्त ही पाँच सौ और दो हजार के जाली नोट बाजार में आ चुके थे ।दुसरी तरफ गैर कानूनी घोषित पाँच  सौ और एक हजार  के जो जाली नोट थे वो भी बैंकों मे आकर अब असली नोट बन गये ।दुसरे शब्दों में कहें तो सरकार ने नोटबंदी का फैसला उनलोगों को फायदा पहुंचाने के लिए लिया था जिनके पास जाली नोट थे।
      भ्रष्टाचार :- नोटबंदी से भ्रष्टाचारियों को बल मिला है ।अब उन्हे रुपयो को रखने के लिए कम जगह की आवश्यकता पङती है ।साथ ही पैसों को लाने और ले जाने में कोई परेशानी नही होती है ।इडिया टुडे ने सर्वे के आधर पर एक रिपोर्ट प्रकाशित किया है जिसमें यह कहा गया है कि भ्रष्टाचार  में लोगो का यकीन बढा है ।नोटबंदी के समय ही कितने बैंक क्रमचारी भ्रष्टाचार करते पकङे गये ।कई बैंको ने जम कर कालेधन को सफेद करने में  योगदान दिया और बदले में क्रमचारी मालामाल हो गये ।इसको यों कहें कि नोटबंदी ने भ्रष्टाचारियों कि सूची में कुछ और नामों को जोङने का काम किया है ।
         इस तरह यह स्पष्ट है कि नोटबंदी की घोषणा करते समय सरकार ने जिन उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए नोटबंदी लागू किया था उन उद्देश्यों को प्राप्त  नही किया  जा सका ।लेकिन हाँ नोटबंदी के कुछ फायदे भी हुए ।अब लोगों के बीच नगदी का प्रचलन पहले से कम हुआ है और लोग कैशलेश को प्रोत्साहित कर रहे हैं ।सारे पैसे बैंकों में आ जाने से आयकरदाताओं की संख्या भी बढी है ।नोटबंदी के पूर्व जो पैसे बाजार में नहीं थे वो पैसे भी बाजार में या बैंकों में आ गये जिससे रुपयों का प्रवाह अधिक हो गया है ।परिणामत: लोगों की क्रयशक्ति में वृद्धि हुई है ।इतना ही नही सारे पैसे बैंकों में आ जाने से सरकार उन पैसों का सही इस्तेमाल कर नयी  नयी योजनाओं की शुरुआत कर सकती है ।सरकार के द्वारा भी नोटबंदी के फायदे बताये जाते हैं तो यह निश्चित रुप से कहा जाता है कि हमें देश की इकोनाँमी को डीजीटल करना था जिसमें नोटबंदी कामयाब रहा है ।दुसरे शब्दों में यों कहें कि सरकार अपने छुपे हुए एजेंडों को लागू कर रही है या “खिशियानी बिल्ली खंभा नोचे वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है ।ऐसे में सरकार को नोटबंदी की पहली सालगिरह का जश्न  मनाने में अधिक उतावलेपन दिखाने की जरुरत नहीं है ।दुसरी तरफ विपक्ष नोटबंदी की पहली सालगिरह को काला दिवस के रुप मनाने की तैयारी कर रहा है जो एक तरह से सही कहा जा सकता है ।जिन उपलब्धियों को सरकार आज बांया करती है उसे दुसरे रास्ते अपना कर भी हासिल किया जा सकता था ।इन उपलब्धियों को पाने के लिए सवा  सौ करोड़ देशवासियों को बैंक के आगे कतार लगाने के लिए विवश करने की जरुरत नहीं थी ।कितने मासूम ,निर्दोष जो अपने पैसे लेने के लिए जान गंवा बैठे उन्हे बचाया जा सकता था और उन उपलब्धियों को सरकार जिसे आज बांया करती है उसे प्राप्त भी किया जा सकता था ।
सरकार के नोटबंदी लागू करने के पश्चात पे टी एम जो चायनीज कम्पनी है का कारोबार ग्यारह प्रतिशत से बढकर अट्ठाइस प्रतिशत पहुँच गया ।सरकार नोटबंदी की उपलब्धियों में सबसे बङी बङी उपलब्धि के रुप में कैशलेश या डीजीटल बनेगा इंडिया को बताती है । ऐसी परिस्थिति में  नोटबंदी की घोषणा करते समय सरकार को भी इन्हीं उद्देश्यों को बताना चाहिये था न कि कालेधन को समाप्त करना ,आतंकवाद को खत्म करना ,भ्रष्टाचार को समाप्त करना । वास्तव में जब सरकार के रणनीतिकारों को नोटबंदी का लक्ष्य प्राप्त होता नही दिखा तो उन्होंने नोटबंदी से जो प्राप्त होता दिखा उसे ही नोटबंदी का उद्देश्य बताना प्रारंभ कर दिया और इसमे सरकार सफल भी होती दिख रही है ।
इस तरह यह कहना अधिक श्रेयश्कर होगा कि सरकार सवा सौ करोङ देशवािशयों को बैंको के आगे कतारबद्ध कर अपने गुप्त उद्देश्यों को पूर्ण करने में सफल रही जिसमें एक सौ से सवा सौ लोगों ने अपनी जानें गवांई ।
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